जानिए भारतीय सेना के इस जांबाज रहस्‍यमय सैनिक को जिसने चीन...

कहते हैं कि हर मनुष्य के शरीर में आत्मा निवास करती है इंसान मर जाता है लेकिन आत्मा कभी नहीं मरती, आत्मा अजर है आत्मा अमर है, जो तो आत्माएं हर तरह की होती हैं अच्छी और बुरी जहां बुरी आत्माएं लोगों को परेशान करती है वही अच्छी आत्माएं लोगों की मदद भी करती हैं। आज हम आपको बताएंगे एक अच्छी आत्मा के बारे में जो आज भी हमारे देश की रक्षा कर रही है। और भारतीय सेना ना केवल उसे वेतन देती है बल्कि समय-समय पर उसका प्रमोशन भी करती है।

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क्या कोई सैनिक मृत्यु पश्चात भी अपनी ड्यूटी कर सकता है। क्या किसी मृत सैनिक की आत्मा अपना कर्तव्य निभाते हुए देश की सीमा की रक्षा कर सकती है। आप सब को यह सवाल अजीब सा लग सकते हैं। आप सब कह सकते हैं कि भजा ये कैसे मुमकिन है परंतु सिक्किम के लोगों और वहां पर तैनात सैनिकों से घर आप पूछेंगे तो वह कहेंगे कि ऐसा पिछले 45 सालों से लगातार हो रहा है।

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सब का मानना है कि पंजाब रेजिमेंट के जवान हरभजन सिंह की आत्मा पिछले 45 सालों से लगातार देश की सीमा की रक्षा कर रही है। सैनिकों का कहना है कि हरभजन सिंह की आत्मा चीन की तरफ से होने वाले खतरे के बारे में पहले से ही उन्हें बता देती है। और यदि भारतीय सैनिकों को चीन के सैनिकों का कोई मूवमेंट पसंद नहीं आता है तो उसके बारे में वह चीन के सैनिकों को भी पहले से ही बता देते हैं। ताकि बात ज्यादा ना बिगड़े और मिल जुलकर बातचीत से उसका हल निकाल लिया जाए चाहे आप इस पर यकीन करें या ना करें मगर इसपर चीनी सैनिक भी विश्वास करते हैं।

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भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लाइट मीटिंग में हरभजन सिंह के नाम की एक खाली कुर्सी लगाई जाती है ताकि वह मीटिंग अटेंड कर सकें।

हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को जिला गुजरावाला में हुआ था। जो कि वर्तमान में पाकिस्तान में है। हरभजन सिंह 24वीं पंजाब रेजिमेंट के जवान थे जोकि 1966 में आर्मी में भर्ती हुए थे पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में सिक्किम में एक दुर्घटना में मारे गए थे। वह एक दिन जब खच्चर पर बैठकर नदी पार कर रहे थे तो खच्‍चर सहित नदी में बह गए।

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उनका शव नदी में बहकर काफी आगे निकल गया। दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपने शव की जगह बताई। सवेरे सैनिकों ने बताई गई जगह से हरभजन सिंह का शव बरामद किया और उसका अंतिम संस्कार किया। हरभजन सिंह के चमत्कार के बाद साथी की सैनिकों की उनमें आस्था बढ़ गई। उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया हालांकि बाद में उनके चमत्कार बढ़ने लगे और वह विशाल जनसमूह की आस्था का केंद्र हो गए। तो उनके लिए एक नए मंदिर का निर्माण किया गया जोकि बाबा हरभजन सिंह मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गंगटोक में जोजिला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच 13000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। पुराना बनकर वाला मंदिर इससे भी 1000 फीट ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है।

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मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की फोटो और उसका सामान रखा है। बाबा हरभजन सिंह अपने मृत्यु के बाद से लगातार ही अपनी ड्यूटी देते आ रहे हैं। जिनके लिए उन्हें बकायदा तनख्वाह भी दी जाती है। उनका सेना में नियमानुसार का प्रमोशन भी किया जाता है। यहां तक कि कुछ साल पहले तक 2 महीने की छुट्टी पर गांव की भेजा जाता था। जिसके लिए ट्रेन दिन की सीट रिजर्व की जाती थी 3 सैनिकों के साथ उनका सारा सामान उनके गांव में जाता था। तथा 2 महीने पूरे होने पर फिर वापस सिक्किम लाया जाता था।

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जिन दो महीने बाद छुट्टी पर रहते थे लेकिन बाबा के सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था। जिससे की बड़ी संख्या में लोग इकट्ठे होने लगे थे कुछ लोगों ने इस आयोजन को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला करार दिया इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया क्योंकि सेना में किसी भी प्रकार के अंधविश्वास की जगह नहीं होती है। लिहाजा सेना ने बाबा को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया। अब बाबा साल के 12 महीने ड्यूटी पर रहते हैं। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है। जिस में प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते हैं।

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बाबा की सेना की भर्ती और जूते रखे जाते हैं कहते हैं कि रोज सफाई करने के बाद भी दोनों उनके जूते में कीचड़ और चंदर पर सलवटें भाई जाते हैं बाबा हरभजन सिंह का मंदिर सनी को और लोगों दोनों की ही आशाओं का केंद्र है इस इलाके में आने वाला हर नया सैनिक सबसे पहले बाबा को माथा टेकने आता है इस मंदिर को लेकर यहां के लोगों में एक अजीब सी मान्यता यह है यदि इस मंदिर में बोतल में भरकर पानी को तीन दिन के लिए रख दिया जाए तो उस पानी में चमत्कारी औषधीय गुण आ जाते हैं। इस पानी को पीने से लोगों के रोग मिट जाते हैं इसलिए इस मंदिर में नाम लिखी हुई बोतलों का अंबार लगा रहता है यह पानी 21 दिन के अंदर प्रयोग करना होता है।

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